इश्क की आग में तप के बल को मिटाना है,
सोच लिया हमने अपने घर को जलाना है।
मैं मैं जिसके भी सिर पे चढ़ के बोले है,
उसके कदमों में न उसे मिलता ठिकाना है।
अब तो इन्सान हुआ गिरगट से भी माहिर,
दिल तो इस और कहीं नजरों का निशाना है।
जिस और चली जाती है ये दुनिया सारी,
"रैना" को भी इक दिन उधर चले जाना है।
सोच लिया हमने अपने घर को जलाना है।
मैं मैं जिसके भी सिर पे चढ़ के बोले है,
उसके कदमों में न उसे मिलता ठिकाना है।
अब तो इन्सान हुआ गिरगट से भी माहिर,
दिल तो इस और कहीं नजरों का निशाना है।
जिस और चली जाती है ये दुनिया सारी,
"रैना" को भी इक दिन उधर चले जाना है।
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