रविवार, 21 अक्टूबर 2012

tum kaya jno

जिन्दगी के लिये बन्दगी,
बन्दगी को मिली जिन्दगी।

यारों लिखने कुछ और रहा था लिख दिया कुछ और

जानता सब भला आदमी,
रास्ते कब चला आदमी
दुःख सहे चुप रहे क्या करे,
आग में फिर जला आदमी।
दूर तक नजर है दौड़ती,
भीड़ में कब मिला आदमी।
तब फटी आँख हैरान थी,
आदमी ने छला आदमी।
दूरियां कम नही बीच की,
आदमी से मिला आदमी।
अलविदा यार को कह चले,
क्या पता कब मिले आदमी।
है दुखी घर बसा छोड़ कर,
सफर पे फिर चला आदमी। "रैना"

दर्द के शहर में कब दवा,
बेवफा कर वफा दे दुआ।
ये बता क्या खता हो गई,
जान है जिस्म से क्यों जुदा।
जान बुझ ये खता क्यों करे,
दिल मिला फर्ज तू कर अता।
शहर में तू कहाँ खो गया,
ढूंढ़ते यार का हम पता।
दूर तक दस्त है रेत का,
इश्क तो दर्द है इक सजा।
शर्म तो तब करे कुछ मिले,
यार को यार अब दे दगा।
"रैन की शाम थी जब ढली,
यार कह चल दिये अलविदा। ....."रैना"

अफ़सोस अकेले ही जाना होगा,
कोई जाता
गर  तेरे साथ चले होते,
आखिर में इन्सान अकेला जाता।


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