इक ग़ज़ल दोस्तों के नाम
छलकता है हुस्न तेरा कहर ढाये,
सादगी ने चार चाँद भी लगाये।
तेरी नजरे तीर का दिल पे असर है,
मौत आती अब न दिल को चैन आये।
बेवफा होने लगे लख्ते जिगर भी,
आग घर को खून अपना ही लगाये।
हुस्न के दम से जमाना महकता है,
फूल खिलते बज्म रोशन नजर आये।
फेर ली है आँख तूने क्यों बता दे,
काश"रैना"बात अपनी पलट जाये। ...."रैना"
छलकता है हुस्न तेरा कहर ढाये,
सादगी ने चार चाँद भी लगाये।
तेरी नजरे तीर का दिल पे असर है,
मौत आती अब न दिल को चैन आये।
बेवफा होने लगे लख्ते जिगर भी,
आग घर को खून अपना ही लगाये।
हुस्न के दम से जमाना महकता है,
फूल खिलते बज्म रोशन नजर आये।
फेर ली है आँख तूने क्यों बता दे,
काश"रैना"बात अपनी पलट जाये। ...."रैना"
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