सूफी गीत
जब साजन से होगी आँखे चार,
शर्म से होये पानी पानी।
अब भी कर लें सोच विचार,
औ बन्दे तू छोड़ नादानी।
ओ बन्दे छोड़ ..................
मोह माया के नाग ने डसा है,
अपनी बनाई दलदल में धसा है,
इससे बाहर तू निकल न सकता,
चारों और घेरा तू बीच में फसा है,
अब निकल लें इस से बाहर,
दो दिन की जिंदगानी।
ओ बन्दे छोड़ ..................
तू गंगा नहाये कांशी जाये,
मन को फिर भी चैन न आये,
इससे मुक्ति नही मिलेगी,
ये भला तुझे कौन समझाये,
उसके बन्दों को करले प्यार,
"रैना" पे फिर करे मेहरबानी। ......."रैना"
जब साजन से होगी आँखे चार,
शर्म से होये पानी पानी।
अब भी कर लें सोच विचार,
औ बन्दे तू छोड़ नादानी।
ओ बन्दे छोड़ ..................
मोह माया के नाग ने डसा है,
अपनी बनाई दलदल में धसा है,
इससे बाहर तू निकल न सकता,
चारों और घेरा तू बीच में फसा है,
अब निकल लें इस से बाहर,
दो दिन की जिंदगानी।
ओ बन्दे छोड़ ..................
तू गंगा नहाये कांशी जाये,
मन को फिर भी चैन न आये,
इससे मुक्ति नही मिलेगी,
ये भला तुझे कौन समझाये,
उसके बन्दों को करले प्यार,
"रैना" पे फिर करे मेहरबानी। ......."रैना"
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