धर्म क्या है नही जानते,
मुर्ख खुद को खुदा मानते।
बंदगी पे किताबे लिखी,
खाक खुद ही रहे छानते।
वक्त के साथ हम भी चले,
लोग ये भ्रम अब पालते।
भूख से जो निभाते रहे,
शिकन वो बल नही डालते।
शाम की फ़िक्र अब रैन को,
दिन चढ़े में न पहचानते। ...... "रैना"
मुर्ख खुद को खुदा मानते।
बंदगी पे किताबे लिखी,
खाक खुद ही रहे छानते।
वक्त के साथ हम भी चले,
लोग ये भ्रम अब पालते।
भूख से जो निभाते रहे,
शिकन वो बल नही डालते।
शाम की फ़िक्र अब रैन को,
दिन चढ़े में न पहचानते। ...... "रैना"
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