युवा दोस्तों के लिए एक ग़ज़ल
मंजिल तो बुलाती है सबको,जाने वाले की मर्जी है,
वो हाथों को मलते रहते,जिनकी मेहनत ही फर्जी है।
क्यों दोषी किस्मत को कहते,ये दोष तिरे ही कर्मों का,
देख दयावान महान बड़ा, उसको सबसे हमदर्दी है।
देना वाला सबको देता, लेने वाला भी हो कोई,
वो कैसे उस पे मान करे,जिसको लगे गर्मी सर्दी है।
उसने ही सब को हुनर दिया,जो जिसका हिस्सा दे डाला,
लकड़ी है कोई काट रहा,चारागर कोई दर्जी है।
सुन "रैना"जुल्म न करना तू,मेहतन की सूखी खा लेना।
औरों की सुध भी ले लेना,न कभी करनी खुदगर्जी है। "रैना"
मंजिल तो बुलाती है सबको,जाने वाले की मर्जी है,
वो हाथों को मलते रहते,जिनकी मेहनत ही फर्जी है।
क्यों दोषी किस्मत को कहते,ये दोष तिरे ही कर्मों का,
देख दयावान महान बड़ा, उसको सबसे हमदर्दी है।
देना वाला सबको देता, लेने वाला भी हो कोई,
वो कैसे उस पे मान करे,जिसको लगे गर्मी सर्दी है।
उसने ही सब को हुनर दिया,जो जिसका हिस्सा दे डाला,
लकड़ी है कोई काट रहा,चारागर कोई दर्जी है।
सुन "रैना"जुल्म न करना तू,मेहतन की सूखी खा लेना।
औरों की सुध भी ले लेना,न कभी करनी खुदगर्जी है। "रैना"
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