रविवार, 30 जून 2013

muskrata rhta

दोस्तों ये रचना कैसी लगी,

मुस्कराता रहता गम से मुलाकात नही करता,
मैं अपनी आँखों से कभी बरसात नही करता,
बातों को तोलने का हुनर मुझको आता यारों,
तभी महफ़िल में कभी हल्की बात नही करता।
गम सहना उजालों में रहना सीख लिया मैंने,
मैं अपने दिल के घर में कभी रात नही करता।
बस्ती के लोगों को तभी तो भरोसा है मुझ पे,
मैं कभी इधर उधर की पांच सात नही करता।
बुजुर्गों की सेवा नारी का सम्मान मेरी फितरत,
गुमनाम"की यही पूजा वो जात पात नही करता।राजेन्द्र "गुमनाम"

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