दोस्तों को कैसी लगेगी मेरी ये रचना
मन की करना चाहती हर इक जिंदगानी,
मगर किस्मत फेर देती अरमानों पे पानी।
इस दौर में दिल पे कोई जोर नही चलता,
ये जवानी कर जाती है अक्सर ही नादानी।
नसीहत किसी को देना हादसे से कम नही,
बेशक आज की पीड़ी हो गई बहुत सयानी।
मरने के बाद भी तो वो मिटती नही स्याही,
दिल पे लिखी जो बरबाद इश्क की कहानी।
मालिक ने हुनर बक्शा फिर भी"गुमनाम"हूं,
कैसे सरेआम होते मैंने ये तदबीर नही जानी।"राजेन्द्र गुमनाम"
मन की करना चाहती हर इक जिंदगानी,
मगर किस्मत फेर देती अरमानों पे पानी।
इस दौर में दिल पे कोई जोर नही चलता,
ये जवानी कर जाती है अक्सर ही नादानी।
नसीहत किसी को देना हादसे से कम नही,
बेशक आज की पीड़ी हो गई बहुत सयानी।
मरने के बाद भी तो वो मिटती नही स्याही,
दिल पे लिखी जो बरबाद इश्क की कहानी।
मालिक ने हुनर बक्शा फिर भी"गुमनाम"हूं,
कैसे सरेआम होते मैंने ये तदबीर नही जानी।"राजेन्द्र गुमनाम"
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