मंगलवार, 11 जून 2013

ham tdfte magr vo sunte hinhi

दोस्तों दिल पे हाथ रख के पढ़ना

तड़फते है हम मगर वो सुनते ही नही,
अफ़सोस पैरों से कांटें चुनते ही नही।
दिल दे दिया है अब जान भी उन्ही की,
फिर भी हंस के वो हमें मिलते ही नही।
गुलशन में बहारें आई रूखों पे जवानी हैं,
मेरे मन के फूल फिर भी खिलते ही नही।
रुप हुश्न दौलत का गुमान न कीजिये,
जो नीचे देख चलते वो तो गिरते ही नही।
प्यार से हमको चाहे कोई भी खरीद ले,
गुमनाम" हम तो पैसे से बिकते ही नही।राजेन्द्र "गुमनाम "

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