दोस्तों सीरियल की स्क्रिप्ट लिखने का
अधुरा काम पूरा करने में जुट गया हूं,
अब मेरी रचनायें पढ़ने को कम मिलेगी
आज की पेशकश आप की महफ़िल में,
मिट्टी के घर को सजाया न गया,
डूबने से खुद को बचाया न गया।
नजरे इनायत उसकी आबाद हुये,
मगर चमन को महकाया न गया।
बाप के सहारे की लाठी न बन सके,
मां के दूध का कर्ज चुकाया न गया।
कहने को फेरी माला तिलक लगा के,
दिल के घर उसको बिठाया न गया।
गुमनाम"ने जिंदा रखा स्वाभिमान को,
हर चौखट पे सिर झुकाया न गया।"राजेन्द्र गुमनाम"
अधुरा काम पूरा करने में जुट गया हूं,
अब मेरी रचनायें पढ़ने को कम मिलेगी
आज की पेशकश आप की महफ़िल में,
मिट्टी के घर को सजाया न गया,
डूबने से खुद को बचाया न गया।
नजरे इनायत उसकी आबाद हुये,
मगर चमन को महकाया न गया।
बाप के सहारे की लाठी न बन सके,
मां के दूध का कर्ज चुकाया न गया।
कहने को फेरी माला तिलक लगा के,
दिल के घर उसको बिठाया न गया।
गुमनाम"ने जिंदा रखा स्वाभिमान को,
हर चौखट पे सिर झुकाया न गया।"राजेन्द्र गुमनाम"
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