मंगलवार, 4 जून 2013

durga ashtk

दोस्तों मां की किरपा से मेरा द्वारा लिखा गया
 दुर्गा चालीसा किताब का हिस्सा
               दुर्गा अष्टक

दुर्गा रानी कत्ययानी मुझ पे किरपा कीजिए,
भक्ति में तेरी मन रमे मोहे ऐसा वर मां दीजिए।
बंधन तोड़ू तोसे जोड़ू छोड़ दू इस लोक को,
मन समझ के तोसे ला के सफल करू परलोक को।
मुख ये खोलू जय मां बोलू चरणों में तेरे सिर धरु,
मोह माया को छोड़ के मां तेरा ही मैं जप करू।
मैंने माना ये भी जाना मतलबी संसार है,
साचा नाम है मां अम्बे का बाकी सब बेकार है।
शेरो वाली मां निराली दर्शन की अभिलाषा है,
हो गे दर्शन सुख मिले अब चाहू और निराशा है।
दुष्ट नाशक भक्त पालक कम करो ये दूरियां,
वरदानी मां कात्यायनी समझो भी मजबूरियां।
सुर आसुर मां दास तेरे करे हैं भक्ति शिव हरी,
सजिदा करते चंद तारे ऋतु  मां तेरे दर खड़ी।
गुमनाम"तेरा तुझसे खैर मांगे भक्ति तेरे नाम की,
जल बिना ज्यो मछली तड़फे जिन्दगी किस काम की। गुमनाम"
सुप्रभात जी ...................जय जय मां

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें