दिल तड़फे दीवानों सी हालत हो गई,
जिसे देखा न उससे मोहब्बत हो गई।
महफ़िल में सब करे मेरे यार के चर्चें,
अपनी कुछ ऐसी ही सुहबत हो गई।
उसने तो सब कुछ ही बख्शा मुझको,
मेरी फिर भी रोने की आदत हो गई।
जिस थाली में खाना उसमें छेद करना,
इन्सान की कुछ ऐसी फितरत हो गई।
"गुमनाम"को अब तू सरेआम का दे,
गुमनामी से बहुत ही नफरत हो गई।"राजेन्द्र गुमनाम"
जिसे देखा न उससे मोहब्बत हो गई।
महफ़िल में सब करे मेरे यार के चर्चें,
अपनी कुछ ऐसी ही सुहबत हो गई।
उसने तो सब कुछ ही बख्शा मुझको,
मेरी फिर भी रोने की आदत हो गई।
जिस थाली में खाना उसमें छेद करना,
इन्सान की कुछ ऐसी फितरत हो गई।
"गुमनाम"को अब तू सरेआम का दे,
गुमनामी से बहुत ही नफरत हो गई।"राजेन्द्र गुमनाम"
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