जनप्रिय राष्ट्रीय कवि
गुरु सी एम अटल को समर्पित ये रचना
गुमनाम ही सही इक नाम मिल गया,
भटके मुसाफिर को आराम मिल गया।
मेरे लिये तो बन्द हुये थे सारे मयखाने,
साकी की बदौलत मुझे जाम मिल गया।
रावण की कैद में दुखी थी परेशान सीता,
विरहा की मारी सीय को राम मिल गया।
मतलब की दुनिया में कीमत नही लगती,
उसकी किरपा मुझे मेरा दाम मिल गया।
बेइन्तह मिली है ख़ुशी तमाम मुझको,
यूं सूरदास को जैसे घनश्याम मिल गया।
"गुमनाम"पे हुई है"अटल"की मेहरबानी,
कलम के सिपाही को अब काम मिल गया।राजेन्द्र "गुमनाम"
गुरु सी एम अटल को समर्पित ये रचना
गुमनाम ही सही इक नाम मिल गया,
भटके मुसाफिर को आराम मिल गया।
मेरे लिये तो बन्द हुये थे सारे मयखाने,
साकी की बदौलत मुझे जाम मिल गया।
रावण की कैद में दुखी थी परेशान सीता,
विरहा की मारी सीय को राम मिल गया।
मतलब की दुनिया में कीमत नही लगती,
उसकी किरपा मुझे मेरा दाम मिल गया।
बेइन्तह मिली है ख़ुशी तमाम मुझको,
यूं सूरदास को जैसे घनश्याम मिल गया।
"गुमनाम"पे हुई है"अटल"की मेहरबानी,
कलम के सिपाही को अब काम मिल गया।राजेन्द्र "गुमनाम"
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