ये व्यंग्य रचना हम सब के लिए दोस्तों
चुनाव के बादल छाने लगे हैं,
सफेद कौवें गांव आने लगे हैं।
झूठे अश्वासनों की बरसात कर,
जनता को फिर बहकाने लगे हैं।
अपनी काली करतूतें छुपाने को,
दूसरो पे इल्जाम लगाने लगे हैं।
नेताओं के गुण्डों ने कसे लंगौटे,
गांवों में अब दारु पहुंचाने लगे हैं।
धर्म के ठेकेदारों से हो रही वार्ता,
मुखियां अपना दाम बढ़ाने लगे हैं।
देशवासियों वोट की कीमत जानो,
क्यों हम देश को मिटाने लगे हैं।
गुमनाम"पैदा हो गये काले अंग्रेज,
देश को फिर गुलाम बनाने लगे हैं।राजेन्द्र "गुमनाम"
चुनाव के बादल छाने लगे हैं,
सफेद कौवें गांव आने लगे हैं।
झूठे अश्वासनों की बरसात कर,
जनता को फिर बहकाने लगे हैं।
अपनी काली करतूतें छुपाने को,
दूसरो पे इल्जाम लगाने लगे हैं।
नेताओं के गुण्डों ने कसे लंगौटे,
गांवों में अब दारु पहुंचाने लगे हैं।
धर्म के ठेकेदारों से हो रही वार्ता,
मुखियां अपना दाम बढ़ाने लगे हैं।
देशवासियों वोट की कीमत जानो,
क्यों हम देश को मिटाने लगे हैं।
गुमनाम"पैदा हो गये काले अंग्रेज,
देश को फिर गुलाम बनाने लगे हैं।राजेन्द्र "गुमनाम"
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें