आज फिर दिल को समझाया बहुत,
वो नही माना मैंने तो मनाया बहुत।
राहे इश्क पे रोशनी हासिल न हुई,
दिल को मंनिद शमा जलाया बहुत।
देख जलवें आखिर हो गया बिस्मिल,
तीरे ऩजर से दिल को बचाया बहुत।
गर उठता नही तो उसकी मर्जी अपनी,
वैसे इन्सान को वक्त ने जगाया बहुत।
गुमनाम"अपनी औकात नही समझा,
खुद को खुद ने आइना दिखाया बहुत।गुमनाम"
वो नही माना मैंने तो मनाया बहुत।
राहे इश्क पे रोशनी हासिल न हुई,
दिल को मंनिद शमा जलाया बहुत।
देख जलवें आखिर हो गया बिस्मिल,
तीरे ऩजर से दिल को बचाया बहुत।
गर उठता नही तो उसकी मर्जी अपनी,
वैसे इन्सान को वक्त ने जगाया बहुत।
गुमनाम"अपनी औकात नही समझा,
खुद को खुद ने आइना दिखाया बहुत।गुमनाम"
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