तू खफा मुझसे नसीबों की तरह,
जख्म देता क्यों रकीबों की तरह,
काश मेरा दरद समझे तू कभी,
फिर मिले मुझको हबीबों की तरह।"गुमनाम"
क्या तारीफ करे अल्फाज नही हैं,
हर लफ्ज सादगी बयान कर रहा,
हर लाइन इक किताब सी लिख रही है।
जख्म देता क्यों रकीबों की तरह,
काश मेरा दरद समझे तू कभी,
फिर मिले मुझको हबीबों की तरह।"गुमनाम"
क्या तारीफ करे अल्फाज नही हैं,
हर लफ्ज सादगी बयान कर रहा,
हर लाइन इक किताब सी लिख रही है।
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