रविवार, 23 जून 2013

gumnam mai musafi

गुमनाम मैं मुसाफिर तेरे शहर का,
इतना तो बता तेरा ठिकाना है कहां,
भटक रहा हूँ मैं दर ब दर कब का,
अब ये तो बता मुझको जाना है कहां।
इस तरफ गुलशन महकता शबाब है,
उस तरफ मय के संग रखा कबाब है,
उलझ गया मैं कच्चे सूत के जाल में ,
अब दे भी मशवरा दिल लगाना है कहां।

मैं सच का व्यापारी हूं,
माल बिकता नही,
घाटे में चल रहा,
फिर भी ये धंधा छोड़ा नही मैंने।राजेन्द्र "गुमनाम"

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