कोई क्यों लूट कर ले गया मेरी पतंग को मैंने पेचा लड़ाया ही न था."रैना"
ढलती शाम को देख कर मेरी आँख के चश्में बहने लगे."रैना"
हम एक इन्सान को पूजते रहे मगर वो नही पिघला,
काश वो पत्थर होता तो पिघल जाता."रैना"
खैर अब मुझे ये एहसास होने लगा है की उसके दम से ही मेरा दम है."रैना"
मौत तो निश्चित है मगर यादों के दम से कुछ दिन निकल रहे है."रैना"
गिर के संभल सकता हूँ,
मैं उठ के चल सकता हूँ,
एहसान नही किसी का,
इन्सान हूँ बदल सकता हूँ."रैना"
ढलती शाम को देख कर मेरी आँख के चश्में बहने लगे."रैना"
हम एक इन्सान को पूजते रहे मगर वो नही पिघला,
काश वो पत्थर होता तो पिघल जाता."रैना"
खैर अब मुझे ये एहसास होने लगा है की उसके दम से ही मेरा दम है."रैना"
मौत तो निश्चित है मगर यादों के दम से कुछ दिन निकल रहे है."रैना"
गिर के संभल सकता हूँ,
मैं उठ के चल सकता हूँ,
एहसान नही किसी का,
इन्सान हूँ बदल सकता हूँ."रैना"
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें