पेशे खिदमत एक हास्य कविता अपने विचारों से अवगत जरुर करवाए.
जब से हुई शादी तब से निरंतर घिस रहा हु,
यूं कह सकते है दो पाटों के बीच पिस रहा हूँ.
बीवी को पूछता हूँ तो माँ झाड़ती है,
माँ को पूछता हूँ तो बीवी बेलन से मारती है.
दिल का हार्न अब बिलकुल न बजता है,
खाया पीया शरीर को जरा न लगता है.
घर में कलह यादाश्त कुछ खोने लगी है,
मेरी भरी जवानी भी अब बूढ़ी होने लगी है.
बीवी से तो अब रिश्ता तोड़ ही नही सकता,
मगर माँ को पेंशन मिलती उसे छोड़ नही सकता.
क्योकि महंगाई की वजह से वेतन कम पड़ने लगा है,
बच्चो की पढ़ाई का खर्च भी अब बढ़ने लगा है.
अब हालात ऐसे हो चले लगता है जोगी हो जाऊगा,
किसी माडर्न बाबा का चेला बन जयकारे लगाऊगा.
आजकल बाबाओ के चेले पहलवान नजर आते है.
क्योकि बाबे एव चेले मुफ्त का खूब माल उड़ाते है.
वैसे मैं ऐसी योजना तो बनाता हूँ,
मगर बच्चों के बारे सोच सहम जाता हूँ.
अब ये तय दो पाटो के बीच पिसना ही पड़ेगा,
बच्चों के खातिर चंदन की तरह घिसना ही पड़ेगा."रैना"
जब से हुई शादी तब से निरंतर घिस रहा हु,
यूं कह सकते है दो पाटों के बीच पिस रहा हूँ.
बीवी को पूछता हूँ तो माँ झाड़ती है,
माँ को पूछता हूँ तो बीवी बेलन से मारती है.
दिल का हार्न अब बिलकुल न बजता है,
खाया पीया शरीर को जरा न लगता है.
घर में कलह यादाश्त कुछ खोने लगी है,
मेरी भरी जवानी भी अब बूढ़ी होने लगी है.
बीवी से तो अब रिश्ता तोड़ ही नही सकता,
मगर माँ को पेंशन मिलती उसे छोड़ नही सकता.
क्योकि महंगाई की वजह से वेतन कम पड़ने लगा है,
बच्चो की पढ़ाई का खर्च भी अब बढ़ने लगा है.
अब हालात ऐसे हो चले लगता है जोगी हो जाऊगा,
किसी माडर्न बाबा का चेला बन जयकारे लगाऊगा.
आजकल बाबाओ के चेले पहलवान नजर आते है.
क्योकि बाबे एव चेले मुफ्त का खूब माल उड़ाते है.
वैसे मैं ऐसी योजना तो बनाता हूँ,
मगर बच्चों के बारे सोच सहम जाता हूँ.
अब ये तय दो पाटो के बीच पिसना ही पड़ेगा,
बच्चों के खातिर चंदन की तरह घिसना ही पड़ेगा."रैना"
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