नदी के किनारे कभी मिलते नही,
कभी पत्थर भी तो पिघलते नही,
कही बात से मुकरने लगे है लोग,
बचे कुछ जो बात से फिरते नही."रैना".
जब से दुनिया किताबी पढ़ाई पढ़ने लगी है,
तब से प्यार की परिभाषा ही बदलने लगी है.
परवाने भी अब जलने के लिए नही मचलते,
अलबत्ता शमा भी बिजली से जलने लगी है.
बहन भाई बेटे के थे पहले भी बदले मिजाज,
अब माँ की ममता भी वक्त के संग चलने लगी है.
कभी पत्थर भी तो पिघलते नही,
कही बात से मुकरने लगे है लोग,
बचे कुछ जो बात से फिरते नही."रैना".
जब से दुनिया किताबी पढ़ाई पढ़ने लगी है,
तब से प्यार की परिभाषा ही बदलने लगी है.
परवाने भी अब जलने के लिए नही मचलते,
अलबत्ता शमा भी बिजली से जलने लगी है.
बहन भाई बेटे के थे पहले भी बदले मिजाज,
अब माँ की ममता भी वक्त के संग चलने लगी है.
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें