शनिवार, 25 मई 2013

aehsas hota

एहसास होता पास रहता है,
अफ़सोस वो कुछ भी न कहता है।
हरकत मिरी पे है नजर उसकी,
दोस्तों मैं कोई बड़ा ग़ज़ल कार नही
फिर भी इस ग़ज़ल की बहर है गुस्ताखी माफ़
2 +2 +1+2  2 +2 +1+2  2 +2 +1+2

दिन रात निरंतर दौड़ता है आदमी,
ये खास पत्थर  तोड़ता है आदमी।
बेटी की शादी में खर्च कर दे सारे,
सारी उमर जो जोड़ता है आदमी।
गम में ख़ुशी से भी निभाता ही रहे,
अक्सर पटाखें फोड़ता है आदमी।
मौका लगे तो फिर कलम झट ही करे,
यूं कब किसी को छोड़ता है आदमी।
गर हो न हिम्मत की कमी इन्सान में,
फिर तो नदी को मोड़ता है आदमी।
"रैना"कभी अपना गिरेबां देखना,
अब और के घर झांकता है आदमी।"रैना"

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