इक ग़ज़ल उसके नाम।
मन्जिल तू ही साहिल है,
फिर क्यों भटके ये दिल है।
शिकवा तुझ से क्या करना,
सब कुछ ही तो हासिल है।
तेरे चर्चे महफिल में,
बेशक तू इस काबिल है।
हमने इतना जाना है,
तू जीवन में शामिल है।
अदला बदली कर सकता,
तुझको रूतबा हासिल है।
क्या ढूंढे बेगानों में,
अपना ही अब कातिल है।
"रैना"से कुछ मत कहना,
सच जानो वो पागल है। "रैना"
सुप्रभात जी ............good morning ji
मन्जिल तू ही साहिल है,
फिर क्यों भटके ये दिल है।
शिकवा तुझ से क्या करना,
सब कुछ ही तो हासिल है।
तेरे चर्चे महफिल में,
बेशक तू इस काबिल है।
हमने इतना जाना है,
तू जीवन में शामिल है।
अदला बदली कर सकता,
तुझको रूतबा हासिल है।
क्या ढूंढे बेगानों में,
अपना ही अब कातिल है।
"रैना"से कुछ मत कहना,
सच जानो वो पागल है। "रैना"
सुप्रभात जी ............good morning ji
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