दोस्त ये मेरी ग़ज़ल?????????
खास कर युवा वर्ग को समर्पित है
तू छोड़ बूरी लत नशा कर हौसला,
मय खून पीती जिस्म कर दे खोखला।
अब देश में है चल पड़ी ऐसी हवा,
भटका युवा कुछ भी नही है सोचता।
दो चार ही बाकी बचे है ऐब से,
अब हर किसी को देखिये गा झूमता।
है शहर में बिकते नशे हर किस्म के,
कोई किसी को अब नही है रोकता।
जो भी नसीहत दे किसी को सोच कर,
कहते उसे पागल भला है भौंकता।
जो जाम पीता है दवा ही जान कर,
वो अक्ल मंद अक्सर मजे में झूमता।
"रैना" कभी तू सोच ले ये गौर से,
तू मौत के ये खेल क्यों है खेलता। "रैना"
खास कर युवा वर्ग को समर्पित है
तू छोड़ बूरी लत नशा कर हौसला,
मय खून पीती जिस्म कर दे खोखला।
अब देश में है चल पड़ी ऐसी हवा,
भटका युवा कुछ भी नही है सोचता।
दो चार ही बाकी बचे है ऐब से,
अब हर किसी को देखिये गा झूमता।
है शहर में बिकते नशे हर किस्म के,
कोई किसी को अब नही है रोकता।
जो भी नसीहत दे किसी को सोच कर,
कहते उसे पागल भला है भौंकता।
जो जाम पीता है दवा ही जान कर,
वो अक्ल मंद अक्सर मजे में झूमता।
"रैना" कभी तू सोच ले ये गौर से,
तू मौत के ये खेल क्यों है खेलता। "रैना"
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें