बुधवार, 7 नवंबर 2012

dilli kab sone wali hai

ग़ज़ल का नया रुप दोस्तों
तवाजो चाहुगा जी

अब दिल्ली कम ही सोती है,
हर दिन इक रैली होती है।
नेताओं के झूठे भाषण,
भारत मां सुन के रोती है।
महंगाई बन नागिन डसती,
मिलती मुश्किल से रोटी है।
गाली दो या अन्डे मारो,
नेता की चमड़ी मोटी है।
उसके घर में सुख कम रहता,
जिसकी  नीयत ही खोटी है।
बीवी होती घर की लक्ष्मी,
वो पतली चाहे मोटी है।
"रैना" अपनी चिन्ता कर लें,
जीवन तो हीरा मोती है।  "रैना"

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