ग़ज़ल का नया रुप दोस्तों
तवाजो चाहुगा जी
अब दिल्ली कम ही सोती है,
हर दिन इक रैली होती है।
नेताओं के झूठे भाषण,
भारत मां सुन के रोती है।
महंगाई बन नागिन डसती,
मिलती मुश्किल से रोटी है।
गाली दो या अन्डे मारो,
नेता की चमड़ी मोटी है।
उसके घर में सुख कम रहता,
जिसकी नीयत ही खोटी है।
बीवी होती घर की लक्ष्मी,
वो पतली चाहे मोटी है।
"रैना" अपनी चिन्ता कर लें,
जीवन तो हीरा मोती है। "रैना"
तवाजो चाहुगा जी
अब दिल्ली कम ही सोती है,
हर दिन इक रैली होती है।
नेताओं के झूठे भाषण,
भारत मां सुन के रोती है।
महंगाई बन नागिन डसती,
मिलती मुश्किल से रोटी है।
गाली दो या अन्डे मारो,
नेता की चमड़ी मोटी है।
उसके घर में सुख कम रहता,
जिसकी नीयत ही खोटी है।
बीवी होती घर की लक्ष्मी,
वो पतली चाहे मोटी है।
"रैना" अपनी चिन्ता कर लें,
जीवन तो हीरा मोती है। "रैना"
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