दोस्तों इक ग़ज़ल आप के नाम
याद तेरी बावफा निकली,
तू भला क्यों बेवफा निकली।
खेल किस्मत का इसे कहते,
जान मेरी ही कजा निकली।
हम खता करते नही संभव,
ये उसी की तो रजा निकली।
तोहमत किस पे लगा देते,
बात अपनी की हवा निकली।
सोचते है जब कभी तन्हा,
तू वफा थी क्यों जफा निकली।
हैं उठे जब हाथ सजिदे को,
आज मुख से बददुआ निकली।
जिन्दगी भर बन्दगी तेरी,
दर्द की ये इक दवा निकली।"रैना"
याद तेरी बावफा निकली,
तू भला क्यों बेवफा निकली।
खेल किस्मत का इसे कहते,
जान मेरी ही कजा निकली।
हम खता करते नही संभव,
ये उसी की तो रजा निकली।
तोहमत किस पे लगा देते,
बात अपनी की हवा निकली।
सोचते है जब कभी तन्हा,
तू वफा थी क्यों जफा निकली।
हैं उठे जब हाथ सजिदे को,
आज मुख से बददुआ निकली।
जिन्दगी भर बन्दगी तेरी,
दर्द की ये इक दवा निकली।"रैना"
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें