रविवार विशेष ग़ज़ल दोस्तों के लिए
ये बता मैं तुझे यूं भुलाऊ कैसे,
जिन्दगी को नरक अब बनाऊ कैसे।
चश्म में अक्स तेरा बसे तू दिल में
याद तेरी यहां से हटाऊ कैसे।
बिन तिरे हर तरफ है दरद तन्हाई,
बेदर्द मौत खुद को बचाऊ कैसे।
दोस्तों से गिला हम करे भी तो क्या,
हाल दिल का किसी को सुनाऊ कैसे।
अब मसीहा नही है भरोसे काबिल,
आइना भेडियों को दिखाऊ कैसे
सोचता रैन" दिन हर घड़ी हरपल मैं,
दाग दिल पे लगे अब मिटाऊ कैसे। राजेन्द्र रैना "गुमनाम"
ये बता मैं तुझे यूं भुलाऊ कैसे,
जिन्दगी को नरक अब बनाऊ कैसे।
चश्म में अक्स तेरा बसे तू दिल में
याद तेरी यहां से हटाऊ कैसे।
बिन तिरे हर तरफ है दरद तन्हाई,
बेदर्द मौत खुद को बचाऊ कैसे।
दोस्तों से गिला हम करे भी तो क्या,
हाल दिल का किसी को सुनाऊ कैसे।
अब मसीहा नही है भरोसे काबिल,
आइना भेडियों को दिखाऊ कैसे
सोचता रैन" दिन हर घड़ी हरपल मैं,
दाग दिल पे लगे अब मिटाऊ कैसे। राजेन्द्र रैना "गुमनाम"
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