शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

दोस्तों आप की अपनी रचना 

अपने अन्दर तलाशता रहता हूं,
खुद में सिकन्दर तलाशता रहता हूं।
मोती पाने की तमन्ना पाल रखी,
इक समुन्दर तलाशता रहता हूं। 
जो दिखाये गा मंजिल का रास्ता,
मैं वो पैगम्बर तलाशता रहता हूं। 
ईमानदारी की वजह मोहताज हूं,
अब अपना चैम्बर तलाशता रहता हूं।
जिधर देखता लगी हैं लम्बी कतारें,
मैं अपना नम्बर तलाशता रहता हूं। 
"रैना"मुफ़्लिस का तुम हाल मत पूछो,
सिर छुपाने को अम्बर तलाशता रहता हूं। राजेन्द्र रैना गुमनाम   
                                            094160 76914 

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