सोमवार, 19 अगस्त 2013

दोस्तों सोच समझ ध्यान से पढ़ना अपनी रचना को 

इस ओर उस पार चले,
तेरी ही सरकार चले।
तेरे दम से जहां रोशन,
रहमत तेरी संसार चले।  
मेरे बारे भी सोच करले,
क्यों जीते जी मार चले।
मेहरबानी है मेरी मां की,
जिससे ये घर बाहर चले।
अपने तन पे फटे कपड़े,
कोरे पहन हो तैयार चले 
जीते जी कोई कदर नही,
मरे संग अपने यार चले।
चारागर बेवफा निकला,
मायूस हो के बीमार चले।
उपर से चलती राजनीति,
कब नीचे से भ्रष्टाचार चले। 
पाक समझे कमजोर हमको,
रोज सीमा पे हथियार चले।
तब बरबादी नही है रूकती,
जब वक्त की तलवार चले। 
तेरी बेवफाई का है सदका,
"रैना"हम जिन्दगी हार चले। राजेन्द्र रैना "गुमनाम" 

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