दोस्तों यार को समर्पित ये ग़ज़ल
आखिर क्या वो मजबूरी है,
हमसे क्यों इतनी दूरी है।
हम मुफ़्लिस दीवाने तेरे,
तू दानी की मशहूरी है।
क्या बरपा तेरी बस्ती में,
हर मुखड़ा अब बेनूरी है।
खाने दे मुझको जी भर के,
मां के हाथों की चूरी है।
रैना"सोचे दिन कब निकले,
जिंदगी हो जाती पूरी है। राजेन्द्र रैना गुमनाम"
सुप्रभात जी … जय जय मां
आखिर क्या वो मजबूरी है,
हमसे क्यों इतनी दूरी है।
हम मुफ़्लिस दीवाने तेरे,
तू दानी की मशहूरी है।
क्या बरपा तेरी बस्ती में,
हर मुखड़ा अब बेनूरी है।
खाने दे मुझको जी भर के,
मां के हाथों की चूरी है।
रैना"सोचे दिन कब निकले,
जिंदगी हो जाती पूरी है। राजेन्द्र रैना गुमनाम"
सुप्रभात जी … जय जय मां
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