शुक्रवार, 2 अगस्त 2013

aakhir kya teri

दोस्तों यार को समर्पित ये ग़ज़ल

आखिर क्या वो मजबूरी है,
हमसे क्यों इतनी दूरी है।
हम मुफ़्लिस दीवाने तेरे,
तू दानी की मशहूरी है।
क्या बरपा तेरी बस्ती में,
हर मुखड़ा अब बेनूरी है।   
खाने दे मुझको जी भर के,
मां के हाथों की चूरी है।
रैना"सोचे दिन कब निकले,
जिंदगी हो जाती पूरी है। राजेन्द्र रैना गुमनाम"
सुप्रभात जी  …  जय जय मां  

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