दोस्तों देखना ये रचना कहां तक सही है
दोस्ती तो है मगर किताबों में,
तंगी में दोस्त मिलते ख्वाबों में।
इस जमाने ने अब तौर बदला,
दोस्ती घुल मिल गई शराबों में।
कृष्ण से पूछता सुदामा क्यों अब,
दोस्ती का फूल न खिले बागों में।
जो दोस्ती की चमक बराबर रखे,
उल्फत का तेल न इन चिरागों में।
रैना"मत कर अब दोस्ती की बातें,
खो जा फिर से उन पुरानी यादों में। राजेन्द्र रैना "गुमनाम"
दोस्ती तो है मगर किताबों में,
तंगी में दोस्त मिलते ख्वाबों में।
इस जमाने ने अब तौर बदला,
दोस्ती घुल मिल गई शराबों में।
कृष्ण से पूछता सुदामा क्यों अब,
दोस्ती का फूल न खिले बागों में।
जो दोस्ती की चमक बराबर रखे,
उल्फत का तेल न इन चिरागों में।
रैना"मत कर अब दोस्ती की बातें,
खो जा फिर से उन पुरानी यादों में। राजेन्द्र रैना "गुमनाम"
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