शनिवार, 12 नवंबर 2011

mere rkibo se

एक सूफी रचना आप सब के लिए मगर इस पे गौर फरमाने की जरूरत है.
मेरे रकीबों से तू निभाना नही,
कहा मैंने मगर तूने माना नही.
कहा मैंने मगर......................
किया वादा तेरे संग निभाऊ गी,
सइयां तेरे ही रंग में रंग जाऊ गी,
आई होश तूने मुझे पहचाना नही,
कहा मैंने मगर......................
मोह माया के झूले में झूल गई,
चढ़ा हुस्न का रंग सब भूल गई,
कौन अपना है तूने जाना नही.
कहा मैंने मगर......................
अब जमीं पे पैर तू रखती नही
कभी सइयां के दर फटकी नही,
याद तुझको अपना दीवाना नही.
कहा मैंने मगर......................
"रैना" मान ले अब खता तेरी,
वरना हो जाएगी बहुत ही देरी,
वहां भटके गा मिले ठिकाना नही.
कहा मैंने मगर...................... "रैना"
सुप्रभात जी ................good morning

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