अब आम आदमी का हाथ नर्म है,
चोर उच्चकों की जेब खूब गर्म है,
कुछ दौर ही ऐसा आ गया है यारों,
वही मालामाल जिसका भ्रष्ट कर्म है.
बेशक बेगरत को भी शर्म आ जाती,
मगर अब नेता को न आती शर्म है.
शर्म आये भी को बेशर्म के सर ताज,
कुर्सी धन दौलत यही नेता का धर्म है. "रैना"
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