रविवार, 9 अक्टूबर 2011

ye hawa

ये हवा भी खूब है,
 पहले चिराग को जलाती है,
फिर थपेड़े मार मार के बुझाती है.
क्या हवा चिराग की हिम्मत अजमाती है,
या उसे बुझ बुझ कर जलना सिखाती है.
मगर इन दोनों की कहानी कुछ और ही बताती है,
वो इक अदृश्य शक्ति ही बुझाती जलाती है,
इन्सान को बार बार यही समझाती है,
बुझ बुझ के जलना है, गिर गिर के संभलना है,
मगर मकसद नही बदलना है.
यही तो हवा और चिराग का सन्देश है.
वो ही आदि अंत और शेष है---------------- "रैना" 

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