गुरुवार, 6 अक्टूबर 2011

grib majloom

गरीब,मजलूम, मजबूर पे, खूब भड़ास निकालते, 
मगर  प्यार करने के लिए, कुत्ते का बच्चा पालते.
मेरे शहर के कुछ लोग,मेरे शहर के कुछ लोग-----
सिर्फ वक्ता ढोंगी बाबा पे तो सब  कर दिया निसार,
मगर दर पे आये भिखारी को भीख भी नही डालते.
मेरे शहर के कुछ लोग,मेरे शहर के कुछ लोग-----
इस दुनिया पैसे की मंडी में हर शै बिकाऊ हो गई,
लोकतंत्र की ताकत वोट ही  कारगर हथियार है,
मगर शराब पी पैसे ले बिना समझे वोट डालते.
मेरे शहर के कुछ लोग,मेरे शहर के कुछ लोग-----
वो त्याग,प्यार  माँ बाप का, भूल जाते है तमाम, 
बड़ी बेदर्दी बेरहमी से माँ बाप को घर से निकालते. 
मेरे शहर के कुछ लोग,मेरे शहर के कुछ लोग-----

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें