अब तो हर किसी का चेहरा जर्द लगे है,
होंठ तो हंसते मगर दिल में दर्द लगे है.
खत्म नही होता यादों का सिलसिला,
फिर से आ गया हसीं मौसम सर्द लगे है.
बीच बाजार लुटी इक अबला की इज्जत,
इस बस्ती में अब बचा न कोई मर्द लगे है.
आहिंसा का पाठ पढ़ाने शिक्षा देने वाला,
अब वो भी हांथों में लिए घूमता कर्द लगे है.
महफ़िल में करता है दिले फिराग की बातें,
मगर "रैना" भी बड़ा तंगदिल बेदर्द लगे है. "रैना"
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें