शनिवार, 22 अक्टूबर 2011

man ke mandir

जा के मन्दिर में घंटी बजाता है तू,
मन के मंदिर की घंटी बजाता नही,
सोये रब को जगाने की है सोचता,
क्यों खुद को तू पहले जगाता नही.
जा के मंदिर में औ जा के मंदिर में----
मुख चमके अति मिठ्ठी बाणी तेरी,
पर मन में तो तेरे है  कालस भरी,
तन रगड़े नहाये है तू प्रतिदिन,
पर मन की मैल को छुड़ाता नही.
जा के मंदिर में घटी बजाता है तू,
मन के मंदिर ------------------ "रैना"
सुप्रभात जी ------------good morning

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें