मुझे अपने घर वो बुलाता रहा,
मगर मैं ही बहाने बनाता रहा.
मुझे अपने घर वो-----------
मुझ मुर्ख को समझाने के लिए,
नेक राह मुझे दिखाने के लिए,
उठाता कभी वो गिराता रहा,
मैं न समझा वो समझाता रहा.
मुझे अपने घर वो------------
उसने एहसान क्या कम है किया,
सब करने को समर्थ तन है दिया,
मैं तो मन को ऊँचा उडाता रहा,
बस ख्वाबों के महल बनाता रहा
मुझे अपने घर वो--------------" रैना"
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें