क्या खाक ऐसी अमीरी जब मन रूष्ट है,
निसंदेह धनवान है वही जो सन्तुष्ट है।
नीयत है जिसकी साफ वो धरमात्मा,
जिसकी नारी पे बुरी नजर वो तो दुष्ट है।
नशे से बराबर दूरी रखता जो नौजवान,
मस्कुलर बदन उसका रहता हृष्ट पुष्ट है।
गुमनाम"अब तू नसीहतें देना छोड़ दे,
आज इन्सान तो पहले से काफी चुस्त है। राजेन्द्र "गुमनाम"
निसंदेह धनवान है वही जो सन्तुष्ट है।
नीयत है जिसकी साफ वो धरमात्मा,
जिसकी नारी पे बुरी नजर वो तो दुष्ट है।
नशे से बराबर दूरी रखता जो नौजवान,
मस्कुलर बदन उसका रहता हृष्ट पुष्ट है।
गुमनाम"अब तू नसीहतें देना छोड़ दे,
आज इन्सान तो पहले से काफी चुस्त है। राजेन्द्र "गुमनाम"
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