शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

jindgi me ab najara

मेरी किताब की इक रचना
 दोस्तों की महफ़िल में

जिंदगी में अब नजारा न रहा,
जो हमारा था हमारा न रहा।
हाथ पकड़े गा न कोई ये चिंता,
वो सहारा अब सहारा न रहा।
बन्दगी करने की हसरत थी मिरी,
देवता मेरा पियारा न रहा।
तरस खाये तो भला क्यों ये बता,
आदमी अब तो बेचारा न रहा।
झूठ सिर चढ़ बोलता है अब यहां,
सच उगलता अब वो नारा न रहा।
सिरफ़"रैना को हैअफ़सोस यही,
ख्वाब में अब वो सितारा न रहा।राजेन्द्र "रैना"

मेरे युवक दोस्तों के लिए

जो हिम्मत से दोस्ती होगी,
फिर तो हर तरफ रौशनी होगी।
तू  उठ कर चलता क्यों नही,
मंजिल तेरा रास्ता देखती होगी।"राजेन्द्र "गुमनाम"

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