रविवार, 4 सितंबर 2016

इक इबादत ऐसे भी की जा सकती है,
रोते को हंसना,
गिरते को उठाना,
मिटते को बचाना,
सोते को जगाना,
उससे दिल लगाना,
खुद को खुद तपाना,
पीछे मैं हटाना,
तू तू को बुलाना।
जीने का बहाना। रैना"@
94160 76914 

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