माँ की स्तुति दोहे
श्रदा भक्ति प्रेम से जो, माँ का ध्यान लगाये,
बड़भागी उस जीव का, जन्म सफल हो जाये.
ज्योत पवित्र है मइया की, दूर अँधेरा भगाये.
श्रदा प्रेम से जहाँ जले,मइया वही पे आये.
उच्चे पर्वत शिखर पे, मइया का दरबार,
सेवक दर्शन को चले हो रही जय जयकार.
अकबर को जब अहम हुआ,आया माँ के दरबार,
सोने को लोहा कर दिया,तोड़ दिया अहंकार.
ध्यानु माँ के दर आया,हाथ लिए तलवार,
शीश काट कर ये कहे, भेंट करो स्वीकार
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