रविवार, 9 अप्रैल 2017

दिल के घर में फिर ज़िकर तेरा,
यूं रहे मुझको फ़िकर तेरा। 
ढूंढते फिरते नहीं मिलता,
ये बता घर है किधर तेरा। 
है गुमां मुझको भला कैसा,
तू बसे दिल में नगर तेरा। 
है नहीं कुछ भी मुझे हासिल,
जान तेरी है जिग़र तेरा।
है नहीं कोई सिवा तेरे,
हर शै पे काबिज़ असर तेरा। 
याद रैना"को न भूली है,
याद आये है शहर तेरा। रैना"



कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें