दोस्तों बहुत दिनों बाद इबादत करने बैठा
पेशे खिदमत है शायद पसन्द आये।
आग भड़के नीर से है बुझाना मुश्किल,
इश्क की बरसात में है नहाना मुश्किल।
रास आती ही नही है वफ़ा उल्फ़त को,
खुद जले उल्फ़त इसे है बचाना मुश्किल।
हर घड़ी बेचैन दिल ढूंढता दर उसका,
है यही अफ़सोस मिलना मिलाना मुश्किल।
इस चमन में गुल वफ़ा के नही हैं खिलते,
गर खिले तो महक से है निभाना मुश्किल।
राग ये आसान सा है लगे यूं लेकिन,
इश्क का गाना बड़ा ही तराना मुश्किल।
स्वाद मय का तो बुरा सा लगे है फिर भी,
जो लगे इक बार फिर तो छुड़ाना मुश्किल।
ख़्वाब टूटे लोग अक्सर सजा लेते हैं,
टूट कर बिखरा हुआ दिल सजाना मुश्किल।
काश "रैना" जान ले राज क्या जीवन का,
इस पहेली का समझ में है आना मुश्किल। रैना"