ये बढ़ती दूरियां घटाने की बात करे,
मिल बैठ मसले सुलझाने की बात करे.
सुबह की रंगोली और गीतों भारी शाम,
आओ फिर वो माहौल बनाने की बात करे,
किस्मत के मारे जो गिर गये है राहों में,
उन बेचारों लाचारों को उठाने की बात करे,
बल्ब जल रहे फिर भी घोर अँधेरा लगता,
आओ दिल के चिराग़ जलाने की बात करे.
देखिये तो हर तरफ दुर्गन्ध का आलम है,
अब वातावरण को महकाने की बात करे.
जिनकी आँखों पे चढ़ गेई है चर्बी देखों,
आओ उन्हें आइना दिखाने की बात करे
जो और बिखरे तो संभल नही पाए गे यारों
गिले शिकवे भूल एक हो जाने की बात करे.
बेवजह जो भटक गये है अपनी राहों से,
मान जाये गे उन्हें समझाने की बात करे.
वो हर जगह मौजूद हर शै में नूर उसका,
फिर भला क्यों मस्जिद,बुतखाने की बात करे.
बहुत रो लिये अब तो सुख गये है आंसूं देखो,
अब तो पागल "रैना" को हँसाने की बात करे.
राजिंदर "रैना"
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