शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2012

char bete

चार भाइयों में हुआ बटवारा,
घर हो गया न्यारा न्यारा.
सामान भी बाँट लिया सारा,
ठंडा भी हुआ चारों का पारा.
माँ की खाट चारों को खटकी,
उठा के जा गली में  पटकी.
एक कहे माँ तुम ले जाओ,
दूसरा कहे बोझ तुम उठाओ.
माँ दुखी बहुत परेशान बड़ी,
ममता को कोसे खड़ी खड़ी.
माँ को कोई शिकवा न गिला,
सोचे जो किस्मत में वो मिला.
मगर बेटों को तरस न आया,
बूढ़ी माँ को वृदआश्रम पहुचाया. 
देखिये कल युग का खेल निराला,
एक विधवा ने चार बेटों को पाला,
मगर चारों ने न एक माँ को संभाला."रैना"

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