आब के रंग में ढल गये होते,
ये नसीबा बदल गये होते।
फिर परेशान हम न यूं रहते,
देख मौसम संभल गये होते।
कुछ सब्र गर किया हुआ होता,
चार दिन और मिल गये होते।
गर लगी आग खूब भड़क जाती,
खत पुराने वो जल गये होते।
वक़्त करता अगर वफ़ा हम से,
तीर नजरों के चल गये होते।
गर मंजिल का पता मिले तब तो,
रैन"अरमां मचल गये होते। "रैना"
अब तक कटी है भटकने में,
कुछ पल फुरसत में
मेरा रूह से