गुरुवार, 19 अगस्त 2010

हम सब के लिए एक खास कविता जो मैंने आजादी दिवस के उपलक्ष में लिखी है इसे याद रखना है,
पेसे खिदमत है  
बेशक अब तो खून हमारा होने लगा है पानी,
तभी तो हम सब भूल रहे है शहीदों की कुर्बानी.
याद करो उन्हें याद करो, भूलो न उनको याद करो,
आजादी के दीवानों को कुर्बां हुए परवानों को.
याद करो, याद करो --------------
धुप देखी न छावं देखी, न देखे पावँ के छाले,
बंदी माँ को मुक्त करवाने निकल पड़े थे मतवाले,
भूखे प्यासे आगे बढ़ते, भारी गम पर उफ़ न करते,
देश प्रेम की लगन थी लागी, हंस के लगा दी जान की बाजी.
याद करो उन्हें याद करो--------------
काल सुनहरी भरी जवानी, फिर भी मन की एक न मानी,
अपना सुख दुःख भूल भुला के, माँ की पीड़ा समझी जानी,
इच्छा अरमां कर के दफन, सर पर बांध लिया था कफन,
मचला खून सर चढ़ कर बोला, मैया रंग दे बसंती चोला.
याद करो उन्हें याद करो--------------
देख फंदे को मन था झुमा, हंस हंस के फांसी को चूमा,
वीरों का उत्साह देख कर दुश्मन का फिर सर था घुमा,
बेशक रोये बहन, माँ, भाई, हिम्मत में पर कमी न आई,
शहीदों की कुर्बानी रंग लाई, अंग्रेजों ने मुहु की खाई,
15 अगस्त का दिन फिर आया, लाल किले पर तिरंगा फहराया,
शहीदों ने उदघोष किया, भारत माँ की जय, भारत माँ की जय----
याद करो उन्हें याद करो, भूलो न उन्हें याद करो------------
राजिंदर "रैना"